Monday, February 02, 2026

एक खेल, एक संकल्प—नशामुक्त भविष्य: 2026

 


खेलों के माध्यम से नशा उन्मूलन (Sports Against Substance Abuse)

— एक सशक्त पहल, एक सुरक्षित भविष्य की ओर

वैश्विक स्तर पर मादक पदार्थों (Substance Abuse) का दुरुपयोग एक गंभीर सामाजिक चुनौती के रूप में उभरकर सामने आया है। इसका दुष्प्रभाव केवल व्यक्ति विशेष तक सीमित न रहकर उसके परिवार, समाज और राष्ट्र की सामाजिक-आर्थिक संरचना को भी प्रभावित करता है। नवीन अध्ययनों के अनुसार माध्यमिक विद्यालयों में अध्ययनरत 12 से 18 वर्ष की आयु के बच्चे इस समस्या के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील हैं। अनावश्यक जिज्ञासा, साथियों का दबाव, उचित मार्गदर्शन एवं जागरूकता की कमी, तथा कई बार सामाजिक-आर्थिक और मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ उन्हें नशे की ओर धकेल देती हैं।

माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 2047 तक नशामुक्त भारत का संकल्प तथा माननीय मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड श्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा राज्य को नशामुक्त बनाने हेतु जन-भागीदारी का आह्वान, हम सभी के लिए एक स्पष्ट दिशा और जिम्मेदारी तय करता है। ऐसे में शिक्षा जगत, शिक्षक, अभिभावक और समाज—सभी की संयुक्त भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

उत्तराखण्ड में वर्तमान परिस्थितियाँ

देहरादून, हल्द्वानी, हरिद्वार, रुद्रपुर, काशीपुर, कोटद्वार, रुड़की, अल्मोड़ा, नैनीताल, मसूरी और श्रीनगर जैसे शहर जो कभी शिक्षा और संस्कारों के केंद्र माने जाते थे, आज नशा तस्करी के उभरते हुए गढ़ बनते जा रहे हैं। यह समस्या अब केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित न रहकर छोटे कस्बों और दूरस्थ गाँवों तक फैल चुकी है।

नशा तस्करी के संगठित नेटवर्क में कई बार बच्चों का दुरुपयोग भी किया जा रहा है। एक ओर बच्चे नशे की लत के शिकार हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वे तस्करी के जाल में भी फँसाए जा रहे हैं। कुल मिलाकर स्थिति अत्यंत भयावह और चिंताजनक है, जिसमें विशेषज्ञों के अनुसार तत्काल एवं समन्वित हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

खेलों की चमत्कारिक और सकारात्मक भूमिका

इन विषम परिस्थितियों में खेल एक प्रभावी, सशक्त और टिकाऊ समाधान के रूप में सामने आते हैं। खेल न केवल बच्चों के शारीरिक विकास में सहायक होते हैं, बल्कि उनमें अनुशासन, टीमवर्क, नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास तथा मानसिक मजबूती जैसे गुणों का भी विकास करते हैं।

अध्ययनों से स्पष्ट है कि जो विद्यार्थी नियमित रूप से खेलों और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों में संलग्न रहते हैं, उनके नशे की गिरफ्त में आने की संभावना लगभग 50 प्रतिशत तक कम हो जाती है। पढ़ाई और खेलों में व्यस्त विद्यार्थी के पास नकारात्मक गतिविधियों के लिए न समय होता है और न ही रुचि।

इस संदर्भ में शिक्षक—विशेषकर खेल शिक्षक—की भूमिका अत्यंत निर्णायक हो जाती है। इतिहास साक्षी है कि सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन में शिक्षकों ने सदैव अग्रणी भूमिका निभाई है। आज फिर वही अवसर हमारे सामने है।

बच्चों के लिए आवश्यक दिशा-निर्देशन

1. संवेदनशील आयु में उपयुक्त मार्गदर्शन

कक्षा 6 से 12 तक के विद्यार्थी भावनात्मक, सामाजिक और शारीरिक विकास के संक्रमणकाल में होते हैं। इस अवस्था में खेल, रचनात्मक गतिविधियाँ और शिक्षक की सकारात्मक उपस्थिति उन्हें सही दिशा देकर नशे जैसी बुराइयों से दूर रख सकती है।

2. समय का सृजनात्मक एवं सकारात्मक उपयोग

जब बच्चे खेल, क्लब गतिविधियाँ, कला, संगीत, NSS/NCC, वाद-विवाद, समूह चर्चा, क्विज़ आदि में सक्रिय रहते हैं, तो वे नकारात्मक प्रभावों से स्वाभाविक रूप से दूर रहते हैं। विद्यालयों में आयोजित कार्यक्रम, कौशल-निर्माण गतिविधियाँ और सामुदायिक सहभागिता उनकी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देती हैं।

3. जीवन कौशल का विकास

खेलों और सह-शैक्षणिक गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में निर्णय-क्षमता, समस्या-समाधान, संचार कौशल, भावनात्मक नियंत्रण और टीमवर्क जैसे जीवन कौशल विकसित होते हैं। वे अनुचित दबाव के सामने “ना” कहना, जिम्मेदार व्यवहार अपनाना और चुनौतियों से जूझना सीखते हैं।

इस कार्यशाला में माया खगड़ियाल, डॉ. संजय रावत, डॉ. माधवी अवस्थी (मनोचिकित्सक), डॉ. अरुण शर्मा, डॉ. सिद्धांत माथुर, मुख्य शिक्षा अधिकारी कुंवर सिंह रावत, DIET प्राचार्य डॉ. अजंता बिष्ट, कार्यक्रम समन्वयक डॉ. आलोक मिश्रा ने अपने प्रेरक विचार रखे। कार्यक्रम में 120 से अधिक शारीरिक शिक्षकों एवं विषय-विशेषज्ञ शिक्षकों ने सहभागिता की।
एससीईआरटी से कार्यक्रम के विशेषज्ञ एवं समन्वयक गोपाल सिंह घुघत्याल एवं  सुनील भट्ट द्वारा विस्तृत प्रस्तुतिकरण भी दिया गया।

4. शिक्षक और समाज की सकारात्मक भूमिका

शिक्षक, वरिष्ठ विद्यार्थी और समाज के जिम्मेदार नागरिक बच्चों के लिए आदर्श और प्रेरणास्रोत बन सकते हैं। बच्चे स्वाभाविक रूप से अपने बड़ों के आचरण का अनुसरण करते हैं। सकारात्मक उदाहरण, अनुशासन और संवेदनशील व्यवहार उन्हें सही मार्ग पर अग्रसर करता है।

कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य

  1. नशा उन्मूलन में खेलों की प्रभावी भूमिका को स्थापित करना।

  2. छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों एवं समुदाय को नशा-विरोधी अभियान से जोड़ना।

  3. नियमित जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से नशे के दुष्परिणामों की जानकारी देना।

  4. खेलों द्वारा आत्म-देखभाल, फिटनेस और मानसिक सुदृढ़ता को बढ़ावा देना।

  5. संवाद कौशल, टीमवर्क और सामाजिक सामंजस्य को सशक्त बनाना।

विद्यालय में खेल शिक्षक (व्यायाम) की प्रस्तावित कार्य-योजना

  1. Substance Abuse के विरुद्ध जन-जागरूकता फैलाना तथा विद्यार्थियों को खेलों एवं अन्य रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ना।

  2. नशे से प्रभावित बच्चों की पहचान करना, साथ ही उनकी पहचान को पूर्णतः गोपनीय रखना।

  3. प्रभावित बच्चों को नशामुक्ति हेतु सक्रिय सहयोग प्रदान करना—जिसमें प्रधानाचार्य, अन्य शिक्षक, SMC एवं PTA की सहभागिता सुनिश्चित हो।

  4. बच्चों के सुचारू पुनर्वास (Smooth Rehabilitation) एवं मुख्यधारा में पुनः एकीकरण (Reintegration) में सक्रिय योगदान देना।

यह निर्विवाद सत्य है कि खेल एक स्वस्थ जीवन-शैली की नींव रखते हैं। खेलों में व्यस्त बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत होते हैं तथा किसी भी प्रकार के व्यसनों से दूर रहते हैं। खेल, क्विज़, वाद-विवाद, विज्ञान प्रतियोगिता, पोस्टर, कला, नृत्य, गायन, समाचार वाचन, नैतिक वचनों के पाठन जैसी विविध गतिविधियाँ बच्चों को सकारात्मक, अनुशासित और जिम्मेदार नागरिक बनाती हैं।

स्वास्थ्य विभाग, पुलिस विभाग, समाज कल्याण विभाग एवं नशामुक्ति के क्षेत्र में कार्यरत स्वयंसेवी संगठनों की सहभागिता से यह अभियान और अधिक प्रभावी बनता है। बन्दना गर्ब्याल निदेशक अकादमिक शोध एवं प्रशिक्षण तथा पदमेन्द्र सकलानी अपर निदेशक SCERT के मार्गदर्शन में संपादित यह कार्यशाला, नशामुक्त समाज के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण और प्रेरक कदम है।