मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता
स्वस्थ मन – सशक्त कार्यस्थल की ओर एक सार्थक पहल
“मानसिक रूप से स्वस्थ कर्मचारी ही किसी संस्था की वास्तविक शक्ति होते हैं।”
एस.सी.ई.आर.टी., उत्तराखण्ड द्वारा कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने, तनाव प्रबंधन के व्यावहारिक उपायों से परिचित कराने तथा सकारात्मक एवं सहयोगात्मक कार्य-संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से “मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम” का सफल आयोजन किया गया।
कार्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य को केवल मानसिक रोगों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि संतुलित, स्वस्थ, सम्मानपूर्ण और उत्पादक जीवन का आधार बताया गया।
मानसिक स्वास्थ्य: आज की अनिवार्य आवश्यकता
निदेशक अकादमिक, शोध एवं प्रशिक्षण, बंदना गर्ब्याल ने निदेशक माध्यमिक शिक्षा, उत्तराखण्ड विनोद सेमल्टी तथा कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मनोज रांगड़ का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान कार्य-परिवेश में बढ़ता कार्यभार, समय-सीमाएँ, बदलती अपेक्षाएँ तथा व्यक्तिगत जीवन की चुनौतियाँ कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं।
कार्यक्रम के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य केवल मानसिक रोगों का अभाव नहीं, बल्कि संतुलित, स्वस्थ और उत्पादक जीवन का आधार है। मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, समय पर पहचान, संवेदनशीलता तथा कार्यस्थल पर सहायक और सहयोगात्मक वातावरण विकसित करना अत्यंत आवश्यक है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के अंतर्गत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार के संदर्भ में मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को रेखांकित किया गया। इसी दिशा में कर्मचारियों को तनाव प्रबंधन के व्यावहारिक उपायों से परिचित कराने और सहयोगात्मक कार्यस्थल विकसित करने हेतु इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
‘आनंदम पाठ्यचर्या-2019’ के माध्यम से विद्यालयों में विद्यार्थियों के सामाजिक एवं भावनात्मक कल्याण को विशेष महत्व दिया गया है। वर्तमान समय में मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर सामाजिक और व्यावसायिक चुनौती के रूप में उभर रहा है, इसलिए इसके प्रति जागरूकता, संवेदनशीलता और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मानसिक स्वास्थ्य की समझ
कार्यक्रम समन्वयक प्रिया गुसाईं ने “Illuminating Minds, Spreading Awareness” विषय पर प्रभावशाली प्रस्तुति दी। उन्होंने वैज्ञानिक और व्यवहारिक उदाहरणों के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य की अवधारणा को सरलता से समझाया।
प्रस्तुति के प्रमुख बिंदु
- मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के व्यवहारिक, भावनात्मक, संज्ञानात्मक और शारीरिक प्रभाव।
- मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े प्रचलित मिथकों का वैज्ञानिक आधार पर खंडन।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन, Mental Healthcare Act तथा सतत विकास लक्ष्य-3 की प्रासंगिकता।
- ABC Model—Affect, Behaviour और Cognition के पारस्परिक संबंध की समझ।
- ध्यान, माइंडफुलनेस तथा तनाव प्रबंधन की उपयोगी वैज्ञानिक तकनीकें।
हँसी, ध्यान और अनुभवात्मक सीख का अनूठा संगम
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मनोज रांगड़ ने “हँसिबो–खेलिबो–धरी ध्यान” विषय पर अत्यंत प्रेरणादायी एवं अनुभवात्मक सत्र संचालित किया। उन्होंने लॉफ्टर योग, माइंडफुलनेस और ध्यान की गतिविधियों के माध्यम से प्रतिभागियों को तनावमुक्त रहने के सरल एवं प्रभावी उपायों से परिचित कराया।
प्रश्नोत्तर सत्र में उन्होंने अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए बताया कि सकारात्मक सोच, संतुलित दृष्टिकोण और नियमित ध्यान मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाने में अत्यंत सहायक हैं।
प्रेरक संदेश एवं संस्थागत दृष्टिकोण
निदेशक माध्यमिक शिक्षा, विनोद सेमल्टी ने कार्यक्रम को अत्यंत प्रेरणादायक और आनंददायक बताते हुए “हँसिबो–खेलिबो–धरी ध्यान” के संदेश को दैनिक जीवन में अपनाने का आह्वान किया तथा इस सार्थक पहल के लिए एस.सी.ई.आर.टी. परिवार को बधाई दी।
अपर निदेशक पद्मेन्द्र सकलानी ने कहा कि ऐसे आयोजन कर्मचारियों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने के साथ-साथ संस्थागत कार्य-संस्कृति को सकारात्मक दिशा प्रदान करते हैं।
सम्मान एवं आभार
कार्यक्रम के समापन अवसर पर मुख्य अतिथि मनोज रांगड़ को निदेशक अकादमिक, शोध एवं प्रशिक्षण बंदना गर्ब्याल, निदेशक माध्यमिक शिक्षा विनोद सेमल्टी, अपर निदेशक पद्मेन्द्र सकलानी तथा सहायक निदेशक डॉ. कृष्ण नन्द बिजल्वाण द्वारा स्मृति-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया।
आयोजन से जुड़े अधिकारियों, विशेषज्ञों तथा प्रतिभागियों के योगदान की सराहना की गई। कार्यक्रम में एस.सी.ई.आर.टी., समग्र शिक्षा अभियान तथा माध्यमिक एवं प्रारम्भिक शिक्षा निदेशालय के अधिकारियों और कर्मचारियों ने सहभागिता की।
यह कार्यक्रम केवल मानसिक स्वास्थ्य के विषय में जानकारी प्रदान करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रतिभागियों को तनाव प्रबंधन, सकारात्मक सोच, भावनात्मक संतुलन तथा सहयोगात्मक कार्य-संस्कृति के व्यावहारिक आयामों से भी परिचित कराने में सफल रहा।
मानसिक रूप से स्वस्थ कर्मचारी ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, प्रभावी प्रशिक्षण और उत्कृष्ट संस्थागत कार्य-संस्कृति की सबसे मजबूत नींव हैं।
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