देहरादून | 4 अगस्त 2026
राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT), देहरादून में कक्षा 3, 4 एवं 5 की नई संस्कृत पाठ्यपुस्तकों के निर्माण के लिए छह दिवसीय कार्यशाला का शुभारम्भ वैदिक मंत्रोच्चार और सरस्वती वन्दना के साथ हुआ। यह कार्यशाला 3 अगस्त से 8 अगस्त 2026 तक आयोजित की जा रही है, जिसमें पूरे उत्तराखण्ड से संस्कृत के विद्वान और विषय विशेषज्ञ सहभागिता कर रहे हैं।
कार्यक्रम का उद्घाटन SCERT के अपर निदेशक पद्मेन्द्र सकलानी ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और ज्ञान परम्परा की पहचान है। उन्होंने कहा कि संस्कृत में अपार ज्ञान और ऊर्जा समाहित है तथा आने वाली पीढ़ियों तक इसे सरल और रोचक रूप में पहुँचाना हम सभी की जिम्मेदारी है। उन्होंने पाठ्यपुस्तक निर्माण में लगे विशेषज्ञों को आश्वस्त किया कि यदि किसी भी प्रकार की संदर्भ सामग्री या अतिरिक्त ग्रंथों की आवश्यकता होगी तो परिषद् द्वारा पूरा सहयोग दिया जाएगा।
कार्यक्रम की शुरुआत वैदिक मंत्रोच्चार और सरस्वती वन्दना से हुई। डॉ. हरिशंकर डिमरी और डॉ. हेमन्त जोशी के नेतृत्व में विद्वानों ने वैदिक मंत्रों का उच्चारण कर पूरे वातावरण को आध्यात्मिक और प्रेरणादायक बना दिया।
इस अवसर पर उपनिदेशक विनोद मटूड़ा ने संस्कृत भाषा के महत्व पर अपने विचार रखते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा को समझने और नई शिक्षा नीति-2020 के उद्देश्यों को साकार करने में संस्कृत की महत्वपूर्ण भूमिका है। कार्यशाला के समन्वयक डॉ. आलोकप्रभा पाण्डेय ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कार्यशाला के उद्देश्यों से सभी को अवगत कराया।
इस कार्यशाला में उत्तराखण्ड के सभी 13 जनपदों से DIET, विद्यालयों और अन्य शैक्षिक संस्थानों के संस्कृत विशेषज्ञ शामिल हुए हैं। प्रमुख प्रतिभागियों में डॉ. निलेश कुमार, डॉ. हेमचन्द्र तिवारी, डॉ. देशबन्धु भट्ट, डॉ. ललित मोहन तिवारी, डॉ. हेम चन्द्र बेलवाल, श्री श्याम लाल नौटियाल, डॉ. हरीशचन्द्र शुक्ल, डॉ. कपिल देव सेमवाल, श्रीमती ममता देवी, डॉ. लक्ष्मी शंकर यादव, श्रीमती सन्देश चौधरी, डॉ. आरती जैन तथा डॉ. सरस्वती पुण्डीर सहित अनेक विद्वानों ने अपनी सहभागिता दर्ज कराई।
छह दिनों तक चलने वाली इस कार्यशाला में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप कक्षा 3, 4 और 5 के विद्यार्थियों के लिए ऐसी संस्कृत पाठ्यपुस्तकों का निर्माण किया जाएगा, जो बाल-केंद्रित, गतिविधि-आधारित, सरल, रोचक और गुणवत्तापूर्ण हों। इसका उद्देश्य बच्चों में संस्कृत भाषा के प्रति रुचि विकसित करना और भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परम्परा से उन्हें सहज रूप से जोड़ना है।