Thursday, November 05, 2026

राष्ट्रीय जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत राज्य स्तरीय लोकनृत्य एवं रोल-प्ले प्रतियोगिता 2026-27 सम्पन्न

 

डॉ उषा कटियार , कार्यक्रम समन्वयक 

राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT), उत्तराखण्ड द्वारा राष्ट्रीय जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम (National Population Education Programme) के अंतर्गत दिनांक 5 नवम्बर 2026 को परिषद के ऑडिटोरियम में राज्य स्तरीय लोकनृत्य एवं रोल-प्ले प्रतियोगिता 2026-27 का भव्य आयोजन किया गया। प्रतियोगिता में प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आए विद्यार्थियों ने लोककला, नृत्य एवं अभिनय के माध्यम से महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों पर प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ देकर अपनी प्रतिभा, रचनात्मकता एवं सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता का परिचय दिया।

कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य अतिथि एवं महानिदेशक, विद्यालयी शिक्षा, उत्तराखण्ड आकांक्षा कौंडे (भा.प्र.से.) द्वारा दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ किया गया। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रसिद्ध संगीत रचनाकार अमित वी. कपूर एवं उत्तराखण्ड की सुप्रसिद्ध लोकगायिका संगीता ढ़ौंढ़ियाल उपस्थित रहे। अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ एवं स्मृति चिह्न भेंट कर किया गया।

कार्यक्रम के स्वागत सत्र में निदेशक, अकादमिक शोध एवं प्रशिक्षण, उत्तराखण्ड वन्दना गर्ब्याल तथा अपर निदेशक, एस.सी.ई.आर.टी. उत्तराखण्ड पद्मेन्द्र सकलानी ने अतिथियों का स्वागत एवं अभिनंदन किया।

महानिदेशक, विद्यालयी शिक्षा, उत्तराखण्ड आकांक्षा कौंडे (भा.प्र.से.) ने अपने संबोधन में कहा कि राष्ट्रीय जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम विद्यार्थियों को जीवन की वास्तविक चुनौतियों, सामाजिक जिम्मेदारियों एवं समसामयिक विषयों के प्रति जागरूक बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। जनसंख्या शिक्षा का उद्देश्य केवल जनसंख्या से जुड़े तथ्यों की जानकारी देना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, लैंगिक समानता, स्वास्थ्य के प्रति सजगता, पर्यावरण संरक्षण तथा जिम्मेदार व्यवहार विकसित करना भी है। उन्होंने कहा कि लोकनृत्य एवं रोल-प्ले जैसी गतिविधियाँ विद्यार्थियों को अपनी स्थानीय संस्कृति और लोकपरंपराओं से जोड़ते हुए सामाजिक संदेशों को रचनात्मक एवं प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान करती हैं। इस प्रकार के आयोजन विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास, संवेदनशीलता एवं जीवन कौशल विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

निदेशक, अकादमिक शोध एवं प्रशिक्षण, उत्तराखण्ड बन्दना गर्ब्याल ने कहा कि राष्ट्रीय जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम विद्यार्थियों में जीवनोपयोगी कौशल, सामाजिक संवेदनशीलता एवं जिम्मेदार नागरिकता की भावना विकसित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। लोकनृत्य एवं रोल-प्ले जैसी रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थी सामाजिक मुद्दों को बेहतर ढंग से समझते हैं तथा अपने विचारों को प्रभावी तरीके से अभिव्यक्त करना सीखते हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रखते हुए उसे जीवन और समाज से जोड़ना आवश्यक है।

अपर निदेशक, एस.सी.ई.आर.टी. उत्तराखण्ड पद्मेन्द्र सकलानी ने कहा कि इस प्रकार की प्रतियोगिताएँ विद्यार्थियों की रचनात्मकता, आत्मविश्वास, अभिव्यक्ति कौशल एवं सामूहिक सहभागिता को प्रोत्साहित करती हैं। लोककला और अभिनय के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता, पारस्परिक संबंधों तथा सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे विषयों पर जागरूकता का संदेश अधिक प्रभावी ढंग से समाज तक पहुँचाया जा सकता है। उन्होंने इस प्रकार के आयोजनों को विद्यालयी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने पर बल दिया।

कार्यक्रम समन्वयक उषा कटियार ने राष्ट्रीय जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम की पृष्ठभूमि, उद्देश्यों एवं प्रतियोगिता की रूपरेखा का परिचय देते हुए कहा कि राष्ट्रीय जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल जनसंख्या संबंधी जानकारी प्रदान करना नहीं, बल्कि उन्हें जीवन की विभिन्न परिस्थितियों एवं सामाजिक चुनौतियों के प्रति जागरूक, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनाना है। उन्होंने कहा कि जनसंख्या शिक्षा के अंतर्गत स्वास्थ्य, पोषण, पर्यावरण संरक्षण, लैंगिक समानता, प्रजनन स्वास्थ्य, पारस्परिक संबंध एवं जीवन कौशल जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विद्यार्थियों की समझ विकसित करना आवश्यक है। लोकनृत्य एवं रोल-प्ले जैसी गतिविधियाँ इन विषयों को विद्यार्थियों तक रोचक, सहज एवं प्रभावशाली ढंग से पहुँचाने का सशक्त माध्यम हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रकार की प्रतियोगिताओं से विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा एवं रचनात्मकता प्रदर्शित करने के साथ-साथ स्थानीय लोकसंस्कृति एवं परंपराओं के माध्यम से सामाजिक जागरूकता का संदेश देने का अवसर मिलता है। उन्होंने आयोजन में प्रतिभाग करने वाले सभी जनपदों, विद्यार्थियों एवं मार्गदर्शक शिक्षकों को धन्यवाद दिया।

लोकनृत्य प्रतियोगिता में पर्यावरण संरक्षण, स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना, प्रजनन स्वास्थ्य एवं HIV की रोकथाम, पारस्परिक संबंध, मूल्य एवं जिम्मेदार नागरिकता तथा भावनात्मक कल्याण एवं मानसिक स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषय निर्धारित किए गए थे। वहीं, रोल-प्ले प्रतियोगिता में लैंगिक समानता, पोषण, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता, पारस्परिक संबंध, हिंसा एवं चोटों के विरुद्ध सुरक्षा तथा भावनात्मक कल्याण एवं मानसिक स्वास्थ्य जैसे समसामयिक विषयों को शामिल किया गया।

प्रतियोगिता में जनपदवार प्रतिभागी टीमों ने लोकनृत्य एवं रोल-प्ले के माध्यम से निर्धारित विषयों पर अपनी प्रस्तुतियाँ दीं। विद्यार्थियों ने अपनी प्रस्तुतियों में लोकसंस्कृति, पारंपरिक कला, संगीत, अभिनय एवं रचनात्मक संवादों का सुंदर समन्वय करते हुए सामाजिक जागरूकता के संदेश दिए। प्रस्तुतियों के माध्यम से विद्यार्थियों ने यह दर्शाया कि लोककला एवं रंगमंच केवल मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन एवं जनजागरूकता के सशक्त माध्यम भी हैं।

कार्यक्रम के दौरान विशिष्ट अतिथि अमित वी. कपूर एवं लोक गायिका संगीता ढ़ौंढ़ियाल ने विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों की सराहना की। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड की समृद्ध लोकसंस्कृति एवं पारंपरिक कलाओं के माध्यम से नई पीढ़ी को सामाजिक सरोकारों से जोड़ना अत्यंत महत्वपूर्ण है। कार्यक्रम में मंच संचालन गोपाल घुघत्याल ने किया।

इस आयोजन के माध्यम से विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक प्रतिभा एवं रचनात्मक अभिव्यक्ति प्रदर्शित करने के साथ-साथ महत्वपूर्ण सामाजिक एवं स्वास्थ्य संबंधी विषयों को समझने का अवसर प्राप्त हुआ। कार्यक्रम ने शिक्षा को कला, संस्कृति एवं सामाजिक जागरूकता से जोड़ने तथा विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवेदनशीलता एवं जिम्मेदार नागरिकता विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रतियोगिता के निष्पक्ष एवं प्रभावी मूल्यांकन के लिए गठित निर्णायक मंडल में डॉ. अजीत पंवार, दून विश्वविद्यालय, डॉ. विवेक सिंह, मेडिकल विशेषज्ञ, साईं बाबा सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, देहरादून तथा सोनिया गैरौला, रंगमंच एवं लोककला कलाकार, देहरादून शामिल रहे। निर्णायकों द्वारा प्रतियोगिता के विभिन्न मानकों के आधार पर प्रतिभागियों की प्रस्तुतियों का मूल्यांकन किया गया।

निर्णायक मंडल द्वारा रोल प्ले प्रतियोगिता की विभिन्न कसौटियों पर प्रतिभागी टीमों का मूल्यांकन किया गया। रोल प्ले में हरिद्वार जनपद के क.पा.इ. कॉलेज, गणेशपुर की टीम ने प्रथम स्थान हासिल किया। देहरादून जनपद के राजकीय बालिका इंटर कॉलेज, लक्खीबाग की टीम ने द्वितीय तथा नैनीताल जनपद के अटल उत्कृष्ट राजकीय इंटर कॉलेज, धानाचूली की टीम ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। 

राज्य स्तरीय लोकनृत्य प्रतियोगिता में जनपद पिथौरागढ़ के क०गा०बा०वि० दशाईथल, गंगोलीहाट ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। जनपद ऊधमसिंह नगर के रा०गाँ०न०वि०, खटीमा ने द्वितीय तथा जनपद बागेश्वर के रा०उ०प्रा०वि०, पनुरागूँठ ने तृतीय स्थान प्राप्त कर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। प्रतियोगिता में प्रतिभागी विद्यार्थियों ने लोकनृत्य की प्रस्तुति, वेशभूषा, लय एवं ताल, नृत्य संरचना तथा लोकनृत्य के माध्यम से जीवन कौशल के प्रदर्शन के आधार पर अपनी प्रतिभा का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। 

प्रतियोगिता में प्रतिभागियों की विषयवस्तु की समझ, जीवन कौशल का प्रदर्शन, अभिनय एवं प्रस्तुतीकरण तथा निर्धारित विषय के प्रभावी समावेशन को मूल्यांकन का आधार बनाया गया।  निर्णायक मंडल द्वारा सभी प्रतिभागी टीमों को उनकी प्रस्तुतियों पर महत्वपूर्ण सुझाव एवं फीडबैक प्रदान किया गया। प्रतियोगिता के परिणामों की घोषणा के उपरांत विजेता जनपदों की टीमों को सम्मान-पत्र एवं पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया गया।

  इस आयोजन के माध्यम से विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा एवं रचनात्मक अभिव्यक्ति प्रदर्शित करने के साथ-साथ महत्वपूर्ण सामाजिक, स्वास्थ्य एवं जीवन कौशल संबंधी विषयों को समझने का अवसर प्राप्त हुआ। कार्यक्रम ने लोककला एवं रंगमंच को जनजागरूकता तथा सामाजिक परिवर्तन के प्रभावी माध्यम के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कार्यक्रम में निदेशक माध्यमिक शिक्षा विनोद सिमल्टी तथा उपनिदेशक विनोद सिंह ने भी विचार व्यक्त किये।  कार्यक्रम का समापन पुरस्कार वितरण एवं धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। रोल प्ले और लोक नृत्य में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली टीमें राष्ट्रीय स्तर पर एन.सी.ई.आर.टी. के द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में प्रतिभाग करेंगी।

समावेशी शिक्षा की दिशा में सार्थक पहल: एससीईआरटी उत्तराखंड की टीम ने किया मायरा केयर सेंटर का शैक्षिक भ्रमण

 

देहरादून | 2 नवंबर 2026

समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) को अधिक प्रभावी, संवेदनशील एवं व्यावहारिक बनाने की दिशा में एससीईआरटी उत्तराखंड की टीम द्वारा देहरादून स्थित मायरा केयर सेंटर (Myra Care Centre) का शैक्षिक भ्रमण किया गया। इस भ्रमण में एससीईआरटी से  रमेश बडोनी, राखी पांडे एवं डॉ. साधना सम्मिलित रहे।

मायरा केयर सेंटर ऑटिज़्म (Autism) एवं विविध अधिगम आवश्यकताओं वाले बच्चों (Diverse Learners) की शिक्षा, व्यवहारिक विकास और पुनर्वास के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहा है। भ्रमण के दौरान संस्थान की प्रमुख एवं अनुभवी ऑटिज़्म एजुकेटर अनीता थपलियाल शर्मा तथा डॉ. राकेश नवानी ने टीम के साथ विशेष शिक्षा, समावेशी शिक्षण पद्धतियों एवं बच्चों के सर्वांगीण विकास से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत चर्चा की।

अनीता शर्मा ने संस्थान का भ्रमण करवाते हुए विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के साथ संचालित शिक्षण गतिविधियों, स्पीच थेरेपी, व्यवहारिक सहयोग (Behavioural Support), सामाजिक कौशल (Social Skills) तथा प्रारंभिक हस्तक्षेप (Early Intervention) की प्रक्रियाओं का प्रदर्शन किया। विशेष रूप से उनके द्वारा विकसित विजुअल लर्निंग टूल्स (Visual Learning Tools) एवं गतिविधि-आधारित शिक्षण पद्धतियां बच्चों की सीखने की प्रक्रिया को सरल, रोचक और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

संस्थान में 15 से 30 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं के लिए संचालित जीवन कौशल (Life Skills) एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण (Vocational Training) की गतिविधियां भी अत्यंत प्रेरणादायक रहीं। इन प्रयासों का उद्देश्य विशेष आवश्यकता वाले युवाओं को दैनिक जीवन में अधिक आत्मनिर्भर बनाना तथा सामाजिक सहभागिता के अवसर उपलब्ध कराना है।

उल्लेखनीय है कि एससीईआरटी उत्तराखंड द्वारा शिक्षकों के लिए समावेशी शिक्षा विषय पर एक ऑनलाइन कोर्स विकसित किया जा रहा है। इस कोर्स को केवल सैद्धांतिक जानकारी तक सीमित न रखते हुए वास्तविक कक्षा-कक्ष परिस्थितियों, बच्चों की विविध आवश्यकताओं, व्यावहारिक गतिविधियों एवं प्रभावी शिक्षण रणनीतियों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। इसी उद्देश्य से मायरा केयर सेंटर का भ्रमण किया गया।

कोर्स विकास में अनीता थपलियाल शर्मा की विशेषज्ञता, डॉ. राकेश नवानी के अनुभव तथा एससीईआरटी एवं अन्य विषय विशेषज्ञों के सहयोग से समावेशी शिक्षण की प्रभावी पद्धतियों, केस स्टडी, विजुअल लर्निंग संसाधनों और गतिविधि-आधारित प्रशिक्षण सामग्री को सम्मिलित करने की योजना है।

निश्चित रूप से मायरा केयर सेंटर द्वारा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों एवं युवाओं के आत्मविश्वास, कौशल विकास, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समावेशन के लिए किया जा रहा कार्य अत्यंत सराहनीय एवं अनुकरणीय है। यह भ्रमण एससीईआरटी के प्रस्तावित ऑनलाइन कोर्स को अधिक उपयोगी, अनुभव-आधारित और शिक्षक-केंद्रित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।

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Wednesday, November 04, 2026

हिमालयी आपदाओं से सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण पहल: नैनीताल में हिमनद झीलों के फटने के जोखिम एवं प्रबंधन रणनीतियों पर कार्यशाला

 

डॉ. आर.एस. टोलिया उत्तराखण्ड प्रशासनिक अकादमी में GLOF के वैज्ञानिक अध्ययन, पूर्व चेतावनी प्रणाली और आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर विशेषज्ञों ने किया मंथन

नैनीताल, उत्तराखण्ड। हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव और प्राकृतिक आपदाओं की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए डॉ. आर.एस. टोलिया उत्तराखण्ड प्रशासनिक अकादमी, नैनीताल में महानिदेशक वी.पी. पाण्डे के दिशा-निर्देशों के क्रम में ‘हिमनद झीलों के फटने का जोखिम एवं रणनीति’ (Glacial Lake Outburst Flood – GLOF) विषय पर एक महत्वपूर्ण कार्यशाला आयोजित की गई।

कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य हिमनद झीलों के फटने से उत्पन्न संभावित आपदाओं का वैज्ञानिक आकलन, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, पूर्व चेतावनी प्रणाली का विकास तथा प्रभावी आपदा प्रबंधन रणनीतियों पर विभिन्न संस्थानों के विशेषज्ञों के साथ विचार-विमर्श करना रहा।

एससीईआरटी उत्तराखण्ड के आपदा प्रबंधन प्राधिकरण प्रकोष्ठ के राज्य सह-समन्वयक विनय थपलियाल एवं भुवनेश पंत ने बताया कि हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते आपदा जोखिमों को देखते हुए वैज्ञानिक संस्थानों, प्रशासनिक एजेंसियों तथा शैक्षिक संस्थानों के बीच समन्वय अत्यंत आवश्यक है। इस प्रकार की कार्यशालाएं आपदा पूर्व तैयारी, जागरूकता और जोखिम न्यूनीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

कार्यशाला का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रकाश चन्द्र, अपर सचिव, आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विभाग, देहरादून तथा विशिष्ट अतिथि मेजर जनरल सुधीर बहल, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), नई दिल्ली, पद्मश्री डॉ. शेखर पाठक, पद्मश्री अनूप साह एवं अकादमी के संयुक्त निदेशक डॉ. महेश कुमार की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ।

संयुक्त निदेशक डॉ. महेश कुमार ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा तथा नेपाल में आई बाढ़ जैसी घटनाएं हमें भविष्य की चुनौतियों के प्रति सचेत करती हैं। उन्होंने आपदा प्रबंधन में वैज्ञानिक अध्ययन, तकनीकी नवाचार, संस्थागत समन्वय और प्रभावी रणनीतियों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता बताई।

मुख्य अतिथि प्रकाश चन्द्र ने हिमनद झीलों के फटने से उत्पन्न जोखिमों के संबंध में शासन स्तर पर किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि विभिन्न हिमनद झीलों का वैज्ञानिक अध्ययन और जोखिम आकलन किया जा रहा है। साथ ही संवेदनशील क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम (Early Warning System) स्थापित करने की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है।

विशिष्ट अतिथि मेजर जनरल सुधीर बहल ने सिक्किम में हिमनद झील फटने से उत्पन्न आपदा के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि आपदा के प्रभाव को कम करने के लिए समय पर चेतावनी, त्वरित प्रतिक्रिया, स्थानीय समुदायों की तैयारी तथा विभिन्न एजेंसियों के बीच प्रभावी समन्वय आवश्यक है।

इस अवसर पर पद्मश्री डॉ. शेखर पाठक एवं पद्मश्री अनूप साह ने भी हिमालयी पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और आपदा जोखिम न्यूनीकरण के संदर्भ में अपने विचार रखे।

कार्यशाला के प्रथम तकनीकी सत्र में GLOF के वैज्ञानिक एवं तकनीकी पहलुओं पर विस्तृत चर्चा हुई। इसमें वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान, देहरादून के डॉ. डी.पी. डोभाल, डॉ. जयराम, डॉ. फारूख आजम, सेवानिवृत्त एडीजीएम डॉ. आनंद शर्मा, डॉ. आर.के. श्रीवास्तव, कुमाऊं विश्वविद्यालय के भू-विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. राजीव उपाध्याय, यूएसडीएमए के जीआईएस विशेषज्ञ रोहित कुमार, आईआईआरएस देहरादून के डॉ. हरीश कर्नाटक, सीबीआरआई रुड़की के डॉ. राजेश दास तथा डॉ. एन.एल. ठकुराल सहित विभिन्न संस्थानों के विशेषज्ञों ने प्रतिभाग किया।

विशेषज्ञों ने हिमनद झीलों की पहचान, उपग्रह आधारित निगरानी, भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS), जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, संवेदनशील क्षेत्रों के वैज्ञानिक आकलन तथा संभावित आपदाओं की पूर्व पहचान जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार साझा किए।

चर्चा में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक, प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली और सामुदायिक जागरूकता के समन्वय से हिमालयी क्षेत्रों में आपदा जोखिम को कम किया जा सकता है।

हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड की भौगोलिक संवेदनशीलता को देखते हुए आपदा प्रबंधन केवल प्रशासनिक एवं वैज्ञानिक संस्थानों तक सीमित नहीं रह सकता। विद्यालयों, शिक्षकों, विद्यार्थियों और स्थानीय समुदायों को भी आपदा सुरक्षा, पूर्व तैयारी तथा सुरक्षित व्यवहार के प्रति जागरूक बनाना आवश्यक है।

इस दिशा में एससीईआरटी उत्तराखण्ड के आपदा प्रबंधन प्रकोष्ठ की सहभागिता विद्यालयी शिक्षा में आपदा जागरूकता, सुरक्षा संस्कृति और सामुदायिक तैयारी को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

कार्यशाला का संचालन कार्यक्रम निदेशक डॉ. मंजू पाण्डे ने किया। इस अवसर पर अकादमी के वी.के. सिंह, रिचांशु शर्मा, पूनम पाठक, पूनम पंत, डॉ. अनिल मिश्रा, नायक एवं समन्वयक डॉ. ओमप्रकाश सहित अन्य अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।

यह कार्यशाला हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते प्राकृतिक आपदा जोखिमों के प्रति वैज्ञानिक समझ विकसित करने, विभिन्न संस्थानों के अनुभव साझा करने तथा भविष्य के लिए प्रभावी आपदा प्रबंधन रणनीतियों को सुदृढ़ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल रही।

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