Thursday, September 24, 2026

कक्षा से खेत तक, जानने से करने तक — अनुभवात्मक अधिगम का एक सार्थक दिवस

 

Capacity Building | Exposure Visit | Hands-on Session | Learning by Doing

देहरादून, 24 सितम्बर 2026।

व्यावसायिक शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल किसी कौशल के बारे में जानना नहीं, बल्कि उसे देखना, समझना, स्वयं करके अनुभव करना और जीवन एवं आजीविका से जोड़ना है। इसी भावना को साकार करते हुए कार्यशाला का चतुर्थ दिवस पूर्णतः अनुभवात्मक अधिगम (Experiential Learning), Exposure Visit, Hands-on Learning तथा Learning by Doing को समर्पित रहा।

कृषि विज्ञान केंद्र में व्यावहारिक अधिगम

कार्यशाला के अंतर्गत प्रतिभागी शिक्षकों के दल ने पंडित सुंदरलाल शर्मा केंद्रीय व्यावसायिक शिक्षा संस्थान (PSSCIVE), भोपाल के प्रोफेसर डॉ. आशीष सोनी के नेतृत्व में कृषि विज्ञान केंद्र, हर्बर्टपुर-विकासनगर, देहरादून का शैक्षिक भ्रमण किया।

यह भ्रमण विशेष रूप से ‘कौशल बोध’ में निहित Life Forms/जीवन रूप से संबंधित गतिविधियों को वास्तविक कार्य-परिस्थितियों में समझने का अवसर बना। प्रतिभागियों ने किचन गार्डन, बागवानी, पशुपालन, मुर्गी पालन तथा मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों को केवल सैद्धांतिक विषय के रूप में नहीं, बल्कि व्यावहारिक कौशल एवं आजीविका के अवसरों के रूप में समझा।

कृषि विज्ञान केंद्र के विषय विशेषज्ञों डॉ. शर्मा, डॉ. सिंह एवं डॉ. राठी ने संबंधित क्षेत्रों के वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक पक्षों की विस्तार से जानकारी दी। इसके बाद प्रतिभागियों ने फार्म का भ्रमण कर विभिन्न गतिविधियों और प्रक्रियाओं को प्रत्यक्ष रूप से देखा तथा विशेषज्ञों से संवाद किया।

इस अनुभव ने “जानने से करने तक” की अवधारणा को वास्तविक अर्थों में जीवंत कर दिया।

खेत से उद्यमिता तक — सीखने का दूसरा पड़ाव

कृषि विज्ञान केंद्र में व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने के बाद शिक्षकों का दल काया लर्निंग सेंटर, तिलबाड़ी पहुँचा। यहां सीखने का दायरा कृषि एवं उत्पादन से आगे बढ़कर उद्यमिता, स्थानीय संसाधनों, आतिथ्य और स्वरोजगार से जुड़ गया।

यहां दो उद्यमशील महिलाओं मंजू कुमाईं एवं सुरेशी पवार द्वारा उत्तराखंड के ग्रामीण परिवेश और स्थानीय संस्कृति की थीम पर आधारित एक सुंदर होम-स्टे एवं आतिथ्य केंद्र संचालित किया जा रहा है।

इन दोनों महिलाओं की उद्यमशील यात्रा प्रतिभागियों के लिए प्रेरणादायक रही। स्थानीय परिवेश, उपलब्ध संसाधनों और अपनी क्षमताओं को पहचानकर उन्होंने जिस प्रकार इस केंद्र को विकसित किया है, वह इस बात का सशक्त उदाहरण है कि उद्यमिता केवल बड़े निवेश से नहीं, बल्कि पहल, आत्मविश्वास, नवाचार, स्थानीय अवसरों की पहचान और निरंतर प्रयास से विकसित होती है।

यह केंद्र Hospitality एवं Human Services के क्षेत्र में कौशल और उद्यमिता का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है। प्रतिभागियों ने यहां समझा कि स्थानीय संस्कृति, खान-पान, प्राकृतिक परिवेश और पारंपरिक जीवनशैली को भी रोजगार एवं स्वरोजगार के अवसरों में परिवर्तित किया जा सकता है।

स्थानीय संसाधनों को शिक्षा से जोड़ने की आवश्यकता

इस Exposure Visit का एक महत्वपूर्ण संदेश यह रहा कि विद्यालयों में व्यावसायिक शिक्षा को केवल विभिन्न व्यवसायों की जानकारी देने तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए।

विद्यार्थियों को अपने आसपास उपलब्ध स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय व्यवसायों और समुदाय में उपस्थित सफल उद्यमियों से जोड़ना आवश्यक है। इससे उनमें अवसरों को पहचानने, समस्या का समाधान खोजने, स्वयं पहल करने, सहयोग से कार्य करने तथा कुछ नया सृजित करने की सोच विकसित की जा सकती है।

व्यावसायिक शिक्षा तभी सार्थक होगी, जब विद्यार्थी यह अनुभव कर सकें कि उनके आसपास उपलब्ध संसाधन, ज्ञान और कौशल भी उनके भविष्य की शिक्षा, रोजगार और उद्यमिता का आधार बन सकते हैं।

सीख — See → Understand → Do → Reflect → Create

आज का पूरा दिन अनुभवात्मक अधिगम की इस प्रक्रिया को चरितार्थ करता रहा—

देखो → समझो → स्वयं करो → अनुभव पर चिंतन करो → नया सृजन करो

“कौशल केवल पढ़ाया नहीं जाता,
उसे करके सीखा जाता है;
और उद्यमिता केवल समझाई नहीं जाती,
उसे अवसरों को पहचानकर जीया जाता है।”

कुल मिलाकर कार्यशाला का चतुर्थ दिवस Capacity Building, Exposure Visit, Hands-on Experience और Learning by Doing का उत्कृष्ट समन्वय रहा। खेत, फार्म, बागवानी, पशुपालन और मत्स्य पालन से लेकर स्थानीय उद्यमिता एवं हॉस्पिटैलिटी तक की यह यात्रा प्रतिभागी शिक्षकों के लिए एक समृद्ध अनुभवात्मक अधिगम यात्रा सिद्ध हुई।

इस दिवस ने कार्यशाला के उद्देश्यों को व्यावहारिक धरातल पर उतारते हुए इस मूल विचार को और मजबूत किया कि—

“बच्चों को कौशल से जोड़ना है तो कक्षा को जीवन से,
सीखने को करने से और शिक्षा को स्थानीय परिवेश एवं आजीविका से जोड़ना होगा।”

इस प्रकार कार्यशाला का चतुर्थ दिवस ‘कक्षा से खेत तक और जानने से करने तक’ की यात्रा के रूप में व्यावसायिक शिक्षा की वास्तविक भावना को प्रतिबिंबित करता रहा।