राज्य शैक्षिक
अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी), उत्तराखंड द्वारा ब्लॉक रिसोर्स पर्सन्स
(बीआरपी) के लिए मानसिक स्वास्थ्य एवं कल्याण विषय पर आयोजित दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम
का शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम का उद्देश्य प्रतिभागियों को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति
संवेदनशील बनाना, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की पहचान
एवं समाधान के लिए आवश्यक कौशल विकसित करना तथा विद्यालयों में विद्यार्थियों के
भावनात्मक और सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देना है।
कार्यक्रम को
संबोधित करते हुए उप निदेशक, विनोद मटूरा ने मानसिक स्वास्थ्य एवं कल्याण के
महत्व पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मानसिक स्वास्थ्य
के प्रति जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है। विद्यालयों में सकारात्मक, सहयोगात्मक एवं
संवेदनशील वातावरण का निर्माण करने में शिक्षकों और शैक्षिक संसाधन व्यक्तियों की
महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने प्रतिभागियों से प्रशिक्षण में प्राप्त ज्ञान एवं
कौशल को अपने कार्यक्षेत्र में प्रभावी रूप से लागू करने का आह्वान किया।
प्रशिक्षण के
प्रथम दिवस का प्रारंभ माइंडफुलनेस (सचेतनता) अभ्यास से हुआ। इस गतिविधि के
माध्यम से प्रतिभागियों को वर्तमान क्षण के प्रति सजग रहने, मानसिक एकाग्रता बढ़ाने
तथा स्वयं की भावनाओं और विचारों को समझने का अनुभव कराया गया।
प्रथम सत्र में व्यसन
(Addiction) एवं उससे उबरने के उपायों पर चर्चा की गई। सत्र में व्यसन के
विभिन्न स्वरूपों, इसके मनोवैज्ञानिक एवं व्यवहारगत पहलुओं तथा इससे प्रभावित व्यक्तियों की
सहायता करने के तरीकों पर प्रकाश डाला गया। प्रतिभागियों को व्यसन की समस्या के
प्रति संवेदनशील एवं सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।
द्वितीय सत्र
में मनोवैज्ञानिक प्राथमिक सहायता (Psychological First Aid) विषय पर प्रशिक्षण दिया
गया। इसमें संकट की स्थिति में प्रभावित व्यक्ति को भावनात्मक सहयोग प्रदान करने,
उसकी बात ध्यानपूर्वक सुनने, उसे सुरक्षित
महसूस कराने तथा आवश्यकता पड़ने पर उचित सहायता एवं विशेषज्ञ परामर्श से जोड़ने के
महत्व को समझाया गया।
अपर निदेशक, पद्मेंद्र सकलानी ने अपने संबोधन में विद्यालयों के सुचारु
एवं प्रभावी संचालन में ब्लॉक रिसोर्स पर्सन्स (बीआरपी) की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि बीआरपी विद्यालयों और शिक्षा विभाग के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप
में कार्य करते हैं तथा शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार और शिक्षकों को आवश्यक सहयोग प्रदान
करने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने बीआरपी के कार्यक्षेत्र में आने
वाली विभिन्न चुनौतियों एवं समस्याओं पर चर्चा करते हुए उनके निराकरण के लिए हर संभव
सहयोग का आश्वासन दिया। साथ ही, उन्होंने इस बात पर विशेष बल
दिया कि शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार के लिए केवल अकादमिक पक्ष ही नहीं, बल्कि शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं स्वयं शैक्षिक कार्मिकों
के मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने प्रतिभागियों
से स्वयं के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने तथा विद्यालयों में सकारात्मक,
संवेदनशील एवं सहयोगपूर्ण वातावरण विकसित करने में सक्रिय भूमिका निभाने
का आह्वान किया।
इसके पश्चात
विद्यालयों में संचालित आनंदम कार्यक्रम एवं सामाजिक, भावनात्मक एवं नैतिक
शिक्षा (SEEL—Social, Emotional and Ethical Learning) पर सत्र आयोजित किया गया।
इसमें विद्यार्थियों में आत्म-जागरूकता, सहानुभूति, भावनात्मक संतुलन, सकारात्मक संबंधों तथा नैतिक
मूल्यों के विकास में इन कार्यक्रमों की भूमिका पर चर्चा की गई। साथ ही, विद्यालयी गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थियों के समग्र विकास और
मानसिक कल्याण को प्रोत्साहित करने पर बल दिया गया।
प्रथम दिवस के
अंतिम सत्र में डॉ. बडोनी ने हैकाथॉन कार्यक्रम के संबंध में प्रतिभागियों
को जागरूक किया। उन्होंने नवाचार के महत्व को स्पष्ट करते हुए बताया कि जीवन में
नई सोच, रचनात्मकता और समस्याओं के समाधान की क्षमता व्यक्ति के व्यक्तिगत एवं
व्यावसायिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है। इस सत्र के माध्यम से
प्रतिभागियों को दैनिक जीवन एवं शैक्षिक कार्यों में नवाचारी दृष्टिकोण अपनाने के
लिए प्रेरित किया गया।
प्रशिक्षण के माध्यम से प्रतिभागियों को मानसिक स्वास्थ्य के विभिन्न पहलुओं की समझ विकसित करने, संकट की परिस्थितियों में उचित प्रतिक्रिया देने तथा विद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए अधिक संवेदनशील, सुरक्षित एवं सहयोगपूर्ण वातावरण तैयार करने की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान किया गया। यह प्रशिक्षण विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था में मानसिक स्वास्थ्य एवं कल्याण को प्राथमिकता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
