कक्षा 3, 4 एवं 5 की राज्य स्तरीय पाठ्य-पुस्तकों के निर्माण हेतु छह दिवसीय कार्यशाला
देहरादून | 03–08 अगस्त 2026
राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT), उत्तराखण्ड में दिनांक 03 अगस्त से 08 अगस्त 2026 तक प्राथमिक स्तर की कक्षा 3, 4 एवं 5 के लिए संस्कृत विषय की राज्य स्तरीय पाठ्य-पुस्तकों के निर्माण हेतु छह दिवसीय प्रथम कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य नई राष्ट्रीय एवं राज्य पाठ्यचर्या की भावना के अनुरूप संस्कृत की ऐसी पाठ्य-पुस्तकों का विकास करना है, जो बच्चों के लिए सरल, रोचक, गतिविधि-आधारित, आनंददायी एवं जीवन से जुड़ी हुई हों।
कार्यशाला का शुभारंभ
कार्यशाला का उद्घाटन अपर निदेशक पदमेन्द्र सकलानी द्वारा किया गया। प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए उन्होंने सभी विषय विशेषज्ञों को शुभकामनाएं दीं तथा अपेक्षा व्यक्त की कि वे अपने ज्ञान, अनुभव और रचनात्मकता का सर्वोत्तम योगदान देकर विद्यार्थियों के लिए गुणवत्तापूर्ण पाठ्यसामग्री तैयार करेंगे।
उन्होंने कहा कि पाठ्य-पुस्तक केवल विषयवस्तु प्रदान करने का माध्यम न होकर बच्चों में जिज्ञासा, भाषा के प्रति रुचि, अभिव्यक्ति, रचनात्मकता तथा भारतीय ज्ञान-परंपरा के प्रति समझ विकसित करने वाली होनी चाहिए।
NCF-2023 एवं SCF-SE-2025 के अनुरूप होगा पाठ्य-पुस्तक निर्माण
विषय समन्वयक एवं कार्यशाला संयोजक डा. आलोक प्रभा पाण्डे द्वारा कार्यशाला के उद्देश्यों, प्रस्तावित पाठ्य-पुस्तकों की रूपरेखा तथा निर्माण प्रक्रिया की विस्तृत जानकारी दी गई। उन्होंने बताया कि कक्षा 3, 4 एवं 5 की संस्कृत पाठ्य-पुस्तकों का विकास मुख्य रूप से National Curriculum Framework (NCF)-2023 तथा State Curriculum Framework for School Education (SCF-SE)-2025 की अनुशंसाओं के अनुरूप किया जाएगा।
पाठ्य-पुस्तकों में बच्चों की आयु, सीखने की क्षमता, स्थानीय परिवेश और अनुभवों को ध्यान में रखते हुए संस्कृत भाषा को सहज एवं आनंददायी रूप में प्रस्तुत करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
DIET एवं विद्यालयों के विषय विशेषज्ञों की सहभागिता
कार्यशाला में राज्य के विभिन्न जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों (DIETs) के संस्कृत प्राध्यापकों के साथ-साथ विद्यालय स्तर के संस्कृत विषय विशेषज्ञों द्वारा सक्रिय प्रतिभाग किया गया।
छह दिवसीय कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञों द्वारा कक्षा 3, 4 एवं 5 के लिए पाठ्य-पुस्तकों की प्रस्तावित संरचना, पाठों का स्वरूप, विषयवस्तु, गतिविधियों, अभ्यासों तथा बच्चों के स्तर के अनुरूप भाषा के चयन पर सामूहिक रूप से कार्य किया गया।
विशेष रूप से निम्न बिंदुओं को पाठ्य-पुस्तक विकास में प्राथमिकता दी गई—
- संस्कृत भाषा को सरल, सहज और संवादात्मक बनाना।
- विषयवस्तु को बच्चों के दैनिक जीवन एवं स्थानीय परिवेश से जोड़ना।
- कहानी, कविता, संवाद, चित्र एवं गतिविधियों के माध्यम से सीखने को रोचक बनाना।
- बाल-केंद्रित एवं गतिविधि-आधारित शिक्षण को प्रोत्साहित करना।
- उत्तराखण्ड की संस्कृति, प्रकृति एवं स्थानीय संदर्भों को उपयुक्त रूप से स्थान देना।
- भाषा कौशल के साथ मूल्यपरक एवं अनुभवात्मक अधिगम को बढ़ावा देना।
- बच्चों में संस्कृत भाषा के प्रति भय के स्थान पर रुचि और सहजता विकसित करना।
कार्यशाला के दौरान उप निदेशक विनोद सिंह द्वारा प्रतिभागियों के कार्य का अवलोकन किया गया। उन्होंने विषय विशेषज्ञों के साथ पाठ्य-पुस्तक निर्माण की प्रक्रिया, विषयवस्तु की प्रस्तुति, भाषा की सरलता तथा बाल मनोविज्ञान के अनुरूप सामग्री के विकास पर चर्चा की।
उन्होंने पुस्तक निर्माण से संबंधित अपने अनुभव एवं महत्वपूर्ण सुझाव साझा करते हुए इस बात पर बल दिया कि प्राथमिक स्तर पर संस्कृत शिक्षण को केवल व्याकरण अथवा स्मरण आधारित न बनाकर संवाद, गतिविधि और प्रयोग आधारित बनाया जाना चाहिए।
कार्यशाला में कक्षा 3, 4 एवं 5 के लिए विद्यार्थियों से अपेक्षित अधिगम उपलब्धियों, दक्षताओं एवं सीखने के स्तर को ध्यान में रखते हुए पाठ्यवस्तु निर्धारित करने पर विस्तृत मंथन किया गया।
इस दौरान यह प्रयास किया गया कि प्रत्येक कक्षा की पाठ्य-पुस्तक पिछले स्तर से स्वाभाविक रूप से जुड़ी हो और बच्चों में क्रमशः सुनने, बोलने, पढ़ने, समझने और सरल अभिव्यक्ति की क्षमता विकसित करे।
कार्यशाला के समापन अवसर पर सहायक निदेशक डॉ के. एन. बिजल्वाण द्वारा प्रतिभागियों द्वारा छह दिनों में किए गए कार्य का अवलोकन किया गया तथा उनके प्रयासों की सराहना करते हुए उत्साहवर्धन किया गया।
उन्होंने अपने विचार एवं अनुभव साझा करते हुए संस्कृत पाठ्य-पुस्तक निर्माण में नवाचार, गुणवत्ता, सरलता एवं बाल-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि नई पाठ्य-पुस्तकों को ऐसा स्वरूप दिया जाना चाहिए जिससे बच्चे संस्कृत को केवल एक विषय के रूप में नहीं, बल्कि सहज रूप से समझी और प्रयोग की जा सकने वाली भाषा के रूप में अनुभव कर सकें।
संस्कृत शिक्षण का नया स्वरूप
SCERT उत्तराखण्ड की यह पहल प्राथमिक स्तर पर संस्कृत शिक्षण को नई दिशा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। NCF-2023 और SCF-SE-2025 की भावना के अनुरूप विकसित की जा रही इन पाठ्य-पुस्तकों में परंपरागत ज्ञान के साथ आधुनिक शिक्षण पद्धतियों, गतिविधि-आधारित अधिगम, स्थानीय संदर्भ और बाल मनोविज्ञान का समुचित समावेश किए जाने का प्रयास किया जा रहा है।
छह दिवसीय प्रथम कार्यशाला में तैयार प्रारंभिक रूपरेखा एवं विषयवस्तु आगे की पाठ्य-पुस्तक विकास प्रक्रिया के लिए आधार प्रदान करेगी। इसका अंतिम उद्देश्य ऐसी गुणवत्तापूर्ण संस्कृत पाठ्यसामग्री विकसित करना है, जिससे बच्चे संस्कृत सीखें ही नहीं, बल्कि उसे समझें, बोलें, आनंद लें और भारतीय भाषा एवं ज्ञान परंपरा से सहज रूप से जुड़ सकें।